देवभूमि उत्तराखंड और इसके पर्यटन स्थल

उत्तराखंड भारत का 27वा राज्य जिसकी राजधानी देहरादून है। जो कि सबसे बड़ा शहर है उत्तराखंड का जनसँख्या 10,086,597, घनत्व 189/km,
क्षेत्रफल, 53,483/km, उत्तराखण्ड मे कुल 13 जिले और 2 मंडल है(कुमाऊँ मण्डलऔर गहड़वाल मण्डल) यहाँ बोली जाने वाली मुख्यतःभाषा( कुमाऊनी, गड्वाली, इस राज्य का गठन 8 नवंबर 2000 को हुआ।

उत्तराखंड जो कि हिमालय के गोद मे बसा हुआ बहुत सुंदर राज्य है। जो की सैलानियों का एक प्रमुख आकर्षण का केंद्र रहता है।उत्तराखंड का पूर्व नाम उत्तरांचल था। जो कि 2007 को बदलकर उत्तराखण्ड कर दिया गया। बता दे कि उत्तराखण्ड जो की हिन्दू धर्म की सबसे पवित्र धरती कहा गया है। वह है उत्तराखण्ड क्योकि इसका दूसरा नाम देवभूमि व तपभूमि भी कहा जाता है। माना यह भी जाता है कि इस धरती मै 36 करोड़ देवी देवताओं का वास है। देश के सबसे पवित्र धामों (केदारनाथ , बदरीनाथ, गंगौत्री व यमनोत्री) जो की उत्तराखंड के चार धाम है। केदारनाथ मैं भगवान शिव का वास है। बद्रीनाथ मे भगवान विष्णु का वास है। दुनिया की बहने वाली सबसे पवित्र नदिया गंगा और यमुना का उद्गम स्थल भी यहाँ ही है। वेसे तो उत्तराखण्ड मैं बहुत सारे तीर्थ स्थान जिनमे से प्रमुख है हरिद्वार एक सुंदर तीर्थ नगरी है ।

हरिद्वार में प्रति बारह वर्षों में कुम्भ मेले का आयोजन किया जाता है जिसमें देश-विदेश से आए करोड़ो श्रद्धालू भाग लेते हैं। राज्य में मंदिरों और तीर्थस्थानों की बहुतायत है, जो स्थानीय देवताओं या शिवजी या दुर्गाजी के अवतारों को समर्पित हैं और जिनका सन्दर्भ हिन्दू धर्मग्रन्थों और गाथाओं में मिलता है। इन मन्दिरों का वास्तुशिल्प स्थानीय प्रतीकात्मक है और शेष भारत से थोड़ा भिन्न है। जागेश्वर में स्थित प्राचीन मन्दिर (देवदार वृक्षों से घिरा हुआ १२४ मन्दिरों का प्राणंग) एतिहासिक रूप से अपनी वास्तुशिल्प विशिष्टता के कारण सर्वाधिक महत्वपूर्ण हैं। तथापि, उत्तराखण्ड केवल हिन्दुओं के लिए ही तीर्थाटन स्थल नहीं है। हिमालय की गोद में स्थित हेमकुण्ड साहिब, सिखों का तीर्थ स्थल है। मिंद्रोलिंग मठ और उसके बौद्ध स्तूप से यहाँ तिब्बती बौद्ध धर्म की भी उपस्थिति है।
उत्तराखण्ड को झीलों व ताल की नगरी भी कहा जाता है। यहाँ बहुत सारी सुंदर झीलें व ताल है, राज्य के प्रमुख तालों व झीलों में गौरीकुण्ड, रूपकुण्ड, नन्दीकुण्ड, डूयोढ़ी ताल, जराल ताल, शहस्त्रा ताल, मासर ताल, नैनीताल, भीमताल, सात ताल, नौकुचिया ताल, सूखा ताल, श्यामला ताल, सुरपा ताल, गरूड़ी ताल, हरीश ताल, लोखम ताल, पार्वती ताल, तड़ाग ताल इत्यादि आते हैं।

  • पर्यटन स्थल
    उत्तराखण्ड में बहुत से पर्यटन स्थल है जहाँ पर भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया से पर्यटक आते हैं, जैसे नैनीताल और मसूरी। राज्य के प्रमुख पर्यटन स्थल हैं:
    केदारनाथ
    नैनीताल
    गंगोत्री
    यमुनोत्री
    बद्रीनाथ
    अल्मोड़ा
    ऋषिकेश
    हेमकुण्ड साहिब
    नानकमत्ता
    फूलों की घाटी
    मसूरी
    देहरादून
    हरिद्वार
    औली
    चकराता
    रानीखेत
    बागेश्वर
    भीमताल
    कौसानी
    लैंसडाउन
    जिम कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान

उत्तराखण्ड की संस्कृति
उत्तराखण्ड एक पहाड़ी प्रदेश है। यहाँ ठण्ड बहुत होती है इसलिए यहाँ लोगों के मकान पक्के होते हैं। दीवारें पत्थरों की होती है। पुराने घरों के ऊपर से पत्थर बिछाए जाते हैं। वर्तमान में लोग सीमेण्ट का उपयोग करने लग गए है। अधिकतर घरों में रात को रोटी तथा दिन में भात (चावल) खाने का प्रचलन है। लगभग हर महीने कोई न कोई त्योहार मनाया जाता है। त्योहार के बहाने अधिकतर घरों में समय-समय पर पकवान बनते हैं। स्थानीय स्तर पर उगाई जाने वाली गहत, रैंस, भट्ट आदि दालों का प्रयोग होता है। प्राचीन समय में मण्डुवा व झुंगोरा स्थानीय मोटा अनाज होता था। अब इनका उत्पादन बहुत कम होता है। अब लोग बाजार से गेहूं व चावल खरीदते हैं। कृषि के साथ पशुपालन लगभग सभी घरों में होता है। घर में उत्पादित अनाज कुछ ही महीनों के लिए पर्याप्त होता है। कस्बों के समीप के लोग दूध का व्यवसाय भी करते हैं। पहाड़ के लोग बहुत परिश्रमी होते है। पहाड़ों को काट-काटकर सीढ़ीदार खेत बनाने का काम इनके परिश्रम को प्रदर्शित भी करता है। पहाड़ में अधिकतर श्रमिक भी पढ़े-लिखे है, चाहे कम ही पढ़े हों। इस कारण इस राज्य की साक्षरता दर भी राष्ट्रीय औसत से कहीं अधिक है।

उत्तराखण्ड के कुछ विशिष्ट खानपान है
▶आलू टमाटर का झोल
▶चैंसू
▶झोई
▶कापिलू
▶मंण्डुए की रोटी
वेशभूषा
पारम्परिक रूप से उत्तराखण्ड की महिलायें घाघरा तथा आँगड़ी, तथा पुरूष चूड़ीदार पजामा व कुर्ता पहनते थे। अब इनका स्थान पेटीकोट, ब्लाउज व साड़ी ने ले लिया है। जाड़ों (सर्दियों) में ऊनी कपड़ों का उपयोग होता है। विवाह आदि शुभ कार्यो के अवसर पर कई क्षेत्रों में अभी भी सनील का घाघरा पहनने की परम्परा है। गले में गलोबन्द, चर्‌यो, जै माला, नाक में नथ, कानों में कर्णफूल, कुण्डल पहनने की परम्परा है। सिर में शीषफूल, हाथों में सोने या चाँदी के पौंजी तथा पैरों में बिछुए, पायजेब, पौंटा पहने जाते हैं। घर परिवार के समारोहों में ही आभूषण पहनने की परम्परा है। विवाहित औरत की पहचान गले में चरेऊ पहनने से होती है। विवाह इत्यादि शुभ अवसरों पर पिछौड़ा पहनने का भी यहाँ चलन आम है।

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