एक नग्म लिख रहा हूँ !

उनकी यादो को सजाके, एक नग्म लिख रहा हूँ।
उनकी परछाई को, अपनी कलम की स्याही से बना रहा हूँ।
वो हैं  तो नहीं हमारे, पर उनको अपना बनाने की चाह कर रहा हूँ।
उससे जुड़े हर पल को, अपनी नग्म में जोड़ रहा हूँ।
उनकी यादो को सजाके, एक नग्म लिख रहा हूँ।।

 

अल्प मिले हम, फिर भी, अनजाने ही सही,
पर एक लम्बे अरसे से साथ चल रहा हूँ।
नजरे तो मिलती है, कुछ पल ही सही,
पर अनंत मिलने की चाह कर रहा हूँ।
उनकी यादो को सजाके, एक नग्म लिख रहा हूँ।।

 

उसकी आँखों की चमक, उसकी चंचलता देख रहा हूँ।
उसकी मुस्कराहट में अपनी ख़ुशी,
उसकी नादानियों में अपना बचपन देख रहा हूँ।
मैं एक कविता रचकर कवि बनने की कोशिश कर रहा हूँ।
उनकी यादो को सजाके, एक नग्म लिख रहा हूँ।।

 

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