गहन है यह अंधकारा

गहन है यह अंधकारा – सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

“गहन है यह अंधकारा” (Gehan Hai Yeh Andhakara),एक हिंदी कविता है जो प्रसिद्ध कवि सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला” द्वारा लिखी गई है। कविता को उस काव्य संग्रह से लिया गया है जिसे उन्होंने 1939 से 1949 के बीच लिखा था।

गहन है यह अंधकारा;
स्वार्थ के अवगुंठनों से
हुआ है लुंठन हमारा।

खड़ी है दीवार जड़ की घेरकर,
बोलते है लोग ज्यों मुँह फेरकर
इस गगन में नहीं दिनकर;
नही शशधर, नही तारा।

कल्पना का ही अपार समुद्र यह,
गरजता है घेरकर तनु, रुद्र यह,
कुछ नही आता समझ में
कहाँ है श्यामल किनारा।

प्रिय मुझे वह चेतना दो देह की,
याद जिससे रहे वंचित गेह की,
खोजता फिरता न पाता हुआ,
मेरा हृदय हारा।

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