एक प्रेम कहानी मेरी भी

‘पुनर्मिलन’ – एक प्रेम कहानी मेरी भी ( रविंदर सिंह )

दोस्तों आज जो कहानी मैं आप को सुनाने जा रहा हूँ। उसका नाम हैं :- "एक प्रेम कहानी मेरी भी।" ये कहानी रविंदर सिंह जी की हैं। ये कहानी उन्होंने कुछ भागो में बाटी है। इसमें इस एक भाग है "पुनर्मिलन।"

रविंदर सिंह जी उस तारीख को याद करते हुऐ लिखते हैं :- मुझे वह तारीख अच्छी तरह याद है : 4 मार्च, 2006 । मैं कोलकाता में था और हैप्पी के घर पहुँचने ही वाला था । सुबह से ही बड़ी कुलबुलाहट हो रही थी क्योंकि मैं अपने उन दोस्तों से तीन साल बाद मिलने जा रहा था जिनको एक ज़माने से ‘गैंग ऑफ फ़ोर’ कहा जाता था । इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद मनप्रीत, अमरदीप, हैप्पी और मैं पहली बार मिलने वाले थे ।

होस्टल में पहले साल हैप्पी और मैं ए ब्लॉक भवन के चौथे माले पर अलग-अलग कमरों में रहते थे । एक ही माले पर रहने के कारण हम एक दूसरे को पहचानते तो थे लेकिन कभी एक-दूसरे से किसी तरह की बातचीत नहीं करना चाहते थे । मैं उसे ‘अच्छा लड़का’ नहीं समझता था क्योंकि उसे लड़ाई मोल लेने और अपनी मार्कशीट पर लाल रंग जुड़वाते जाने का शौक था । लेकिन दुर्भाग्य से, सेकेंड ईयर की शुरुआत में मैं होस्टल देर से लौटा और तब तक सभी कमरे दूसरे छात्रों को दिए जा चुके थे । मेरे पास इसके अलावा और कोई चारा नहीं बचा कि मैं हैप्पी का रूममेट बन जाऊँ । और चूँकि जिंदगी अजीब होती है, चीज़ें नाटकीय ढंग से बदलीं और हम सबसे अच्छे दोस्त बन गए । जिस दिन हमारा पुनर्मिलन तय हुआ उस वक्त वह दो सालों से टीसीएस कंपनी में काम कर रहा था और कंपनी के लंदन प्रोजेक्ट पर काम करते हुए मज़े उठा रहा था । हैप्पी को 6.1 फुट की लंबाई, भरा-पूरा शरीर और बला की सुंदरता मिली थी । और हैप्पी हमेशा खुश रहता था ।

मनप्रीत, जिसे हम एमपी बुलाते, गोल-मटोल, गोरा-चिट्टा और स्वस्थ था । ‘स्वस्थ’ शब्द इस्तेमाल करने का कारण यह है कि अगर मैं उसके लिए सही शब्द ‘मोटा’ इस्तेमाल करूँ तो वह मुझे मार डालेगा, वह हम लोगों में पहला व्यक्ति था जो होस्टल में कंप्यूटर लेकर आया और उसकी उस मशीन में न जाने कितने कंप्यूटर गेम थे । असल में, यही कारण था कि हैप्पी और मैं उससे दोस्ती करना चाहते थे । एमपी काफी पढ़ाकू था । उसने स्कूल के दिनों में गणित ओलंपियाड जीता था और वह हमेशा उसके बारे में डींगें हाँका करता था । वह मोदीनगर का रहने वाला था, लेकिन जिस समय हम फिर से मिल रहे थे वे वह बंगलुरु में ओक्वेन के साथ काम कर रहा था । अमनदीप का नामकरण एमपी ने ‘रामजी’ किया था । मुझे पता नहीं कि उसका यह अजीब नाम कब और क्यों पड़ा । हो सकता है शायद इसलिए क्योंकि वह स्वभाव का सीधा-सादा था । होस्टल में हम लोगों के विपरीत वह बिलकुल निशाचर नहीं था और उसके कमरे की बत्तियाँ ठीक 11 बजे बुझ जाती थीं । कभी-कभार एमपी, हैप्पी और मैं उसके कमरे के सामने 11 बजे से कुछ सेकेंड पहले खड़े हो जाते और गिनती शुरू कर देते, 10, 9, 8, 7, 6, 5, 4, 3, 2, 1...और रामजी सो जाता । अमरदीप के बारे में बस एक ही रहस्यमयी बात थी कि वह साइकिल पर बैठकर कहीं जाता था, हर इतवार । उसने हमें कभी नहीं बताया कि वह कहाँ जाता था । जब भी हमने उसका पीछा करने की कोशिश की, उसे न जाने कैसे पता चल जाता और वह अपना रास्ता बदलकर हमें छका देता । आज भी हममें से कोई उस बारे में नहीं जानता । उस आदमी के बारे में सबसे अच्छी बात उसकी सादगी थी । और, सबसे बड़ी बात यह कि हमारे इंजीनियरिंग बैच के आखिरी सेमेस्टर का टॉपर था । वह हमारे ग्रुप की शान था । वह बरेली का रहने वाला था और तब वह एवाल्युसर्व में काम कर रहा था जब वह एमपी के साथ पुनर्मिलन के लिए हवाई जहाज से कोलकाता आया ।

कॉलेज के बाद हम सब जीवन के ढर्रे में काफी बँध गए थे । एक दिन, हमें पता चला कि हैप्पी लंदन से दो हफ़्तों के लिए आ रहा था । सब फिर से मिलने के लिए उत्साहित थे । ‘कोलकाता में हैप्पी के घर पर 4 मार्च, 2006’ हमने फैसला किया । आखिरकार, उस निर्धारित तारीख को मैं हैप्पी के घर की सीढ़ियाँ तेज़ी से चढ़ कर ऊपर गया । दोपहर के 12.30 बजे मैंने उसके दरवाज़े को खटखटाया । उसकी माँ ने दरवाजा खोला और मुझे अंदर बुलाया । चूँकि मैं उसके घर कई बार जा चुका था । वो मुझे अच्छी तरह जानती थीं । हैप्पी के घर में बहुत अधिक औपचारिकताएँ नहीं होती थीं । मैं जब पानी पी रहा था उन्होंने मुझे बताया कि हैप्पी घर में नहीं था और उसका सेल फोन स्विच ऑफ था । ‘खूब! और उसने मुझसे कहा था कि देर मत करना,’ मैं अपने आपसे बुदबुदाया ।

कुछ देर बाद फिर दरवाज़ा खटखटाने की आवाज़ आई । दरवाज़ा खोलने के लिए मैं अपनी कुर्सी से उठा, क्योंकि हैप्पी की माँ किचेन में थीं । मैंने दरवाज़ा खोला तो कुछ इस तरह का शोर-शराबा होने लगा, ‘ओह...बुर्राह...हैंडसम...हा हा हा...ओहहा हा...!’ नहीं, यह हैप्पी नहीं था । एमपी और अमरदीप आये थे । तीन सालों बाद कॉलेज के अपने दोस्तों से मिलना ऐसा उत्तेजक और पागलपन भरा होता है कि आपको इसका अंदाज़ भी नहीं रहता कि आप किसी और घर में हैं जहाँ आपको कुछ शिष्टाचार दिखाना चाहिए और शांत रहना चाहिए । लेकिन फिर इस पुनर्मिलन का सारा कारण ही यही था कि कॉलेज के दिनों को याद किया जाए और वह उसकी बेहतर शुरुआत थी । जब ड्राइंग रूम में हम सोफे पर बैठ गए तब एमपी ने हैप्पी के बारे में पूछा ।

‘वह अपने घर में भी समय पर नहीं है’, मैंने एमपी की ओर देखते हुए कहा और हम फिर से हँसने लगे । अगले करीब आधे घंटे तक हम तीनों बातें करते रहे, एक दूसरे का मजाक उड़ाते रहे और हैप्पी की माँ का बनाया हुआ लंच । दरवाज़ा हैप्पी की माँ ने खोला । ‘हैप्पी वीर!’ एमपी डाईनिंग टेबल से उठते हुए चिल्लाया । अमनदीप और मैंने एक-दूसरे को देखा क्योंकि जब एमपी हैप्पी के गले लगा तो ऐसा लगा जैसे उसकी आँखों से आँसू निकल आएँगे । हमें याद आया कि जब वे पहरों बैठकर शराब पीते थे तो कैसे रोने लगते थे, जब उनके दिमाग़ की बत्ती गुल हो जाती थी और दिल बातें करने लगता था । अमनदीप और मैं अपना कोक पीते हुए उनकी भावुकता के मज़े लिया करते थे । हम सब खड़े हुए, बारी-बारी से उसके गले लगे और फिर खाने में लग गए! उस दिन खाना बहुत स्वादिष्ट बना था । या शायद इसलिए कि हम लोग बहुत दिनों बाद साथ-साथ खाना खा रहे थे, जिसने उसे खास बना दिया था ।

खाने के बाद हम दूसरे फ़्लैट में चले गए । यह उसी बिल्डिंग में कुछ माले ऊपर था, यह हैप्पी के परिवार का दूसरा फ़्लैट था जो रिश्तेदारों और हम जैसे दोस्तों के लिए था । अंदर जाते हुए हम एमपी के एक चुटकुले पर हँस रहे थे और शायद उस समय भी हँस रहे थे जब हम ड्राईंग रूम में बड़े से काऊच पर धँसे हुए थे । बाँहें फैलाए छत की दीवार की ओर देखते हुए हम खुला-खुला महसूस कर रहे थे । कुछ देर तक तो कोई भी नहीं बोला । और फिर हैप्पी के ठहाके के साथ बातचीत फिर शुरू हुई । मेरे ख्याल से उसे रामजी से जुड़ा कोई प्रसंग याद आ गया था ।

उस शाम हम चारों ने उस फ़्लैट में ज़बरदस्त समय बिताया । हम अगले पिछले जीवन के बारे में बातें करते रहे । कॉलेज की उन खूबसूरत नहीं दिखने वाली लड़कियों के बारे में, कंप्यूटर पर देखी गई अश्लील फिल्मों के बारे में, विदेशों के अपने-अपने अनुभवों के बारे में और भी बहुत सारी बातें । ‘तो तुमको यूरोप अधिक अच्छा लगा या अमेरिका?’ हैप्पी ने उठते हुए मुझसे पूछा । ‘यूरोप,’ मैंने लेटे-लेटे छत की ओर देखते हुए जवाब दिया । ‘क्यों?’ अमरदीप ने पूछा । वह अक्सर हर बात के पीछे के कारण को जानने में दिलचस्पी रखता था (लेकिन उसने हमें यह नहीं बताया कि होस्टल के दिनों में वह हर इतवार को कहाँ जाता था) । ‘यूरोप का अपना इतिहास है । जब आप देश बदलते हैं तो भाषा बदल जाती है खाने की कला और स्थापत्य कला, सफ़र के बेहतरीन साधन, दिलकश नज़ारे, यूरोप में सब कुछ शानदार है,’ मैंने बताने की कोशिश की । ‘तुमने अमेरिका में यह सब नहीं देखा?’ ‘कुछ चीज़ें हैं, लेकिन आने-जाने के साधन उतने अच्छे नहीं हैं जितने यूरोप में । अमेरिका के ज़्यादातर हिस्से में आप और आपकी गाड़ी ही विकल्प होते हैं, केवल न्यूयार्क इसका अपवाद है । आपको वहाँ उतनी भाषाएँ नहीं सुनाई देंगी जितनी आपको यूरोप में सुनने को मिलती हैं । मेरा कहना यह है कि अमेरिका बहुत विकसित है लेकिन मैं यूरोप को अमेरिका से तरजीह दूँगा ।’ अमरदीप ने सिर हिलाया जिसका मतलब था कि उसका सवाल खत्म हुआ । ‘आईटी क्षेत्र की यह सबसे अच्छी बात है, अमरदीप । हमें बहुत सारी जगहों पर जाने का मौका मिल जाता है जिनके बारे में कॉलेज के दिनों में हमने सपने में भी नहीं सोचा था,’ एमपी ने अमरदीप से कहा । कॉलेज के बाद एमपी, हैप्पी और मैंने आईटी क्षेत्र को चुना जबकि अमरदीप ने केपीओ को अपनाया ।

हम एक-दूसरे का साथ पाकर खुश थे । आखिर, कॉलेज में फेयरवेल की रात बड़ी शिद्दत से आराम की ज़रूरत थी...मुझे याद नहीं है कि हम में से उस दोपहर सबसे पहले कौन सोया । ‘उठो गधो । 6.30 बज चुके हैं ।’ कोई हमें सपनों की दुनिया से बाहर निकालने की कोशिश कर रहा था । होस्टल में हममें अमरदीप सबसे पहले उठता था से और ज़ाहिर है वही हम सबको उठाता था । इसलिए हम जानते थे कि वह हमारा सुबह-सवेरे का अमरदीप था । तो भी, यह कैसे अच्छा लग सकता है कि कोई आपका दरवाज़ा पीटकर आपको बिस्तर से उठा दे? हम इनसानों की प्रकृति भी विचित्र होती है-जब हम सोये होते हैं तो हम उस आदमी से नफ़रत करते हैं जो हमें जगाने की कोशिश करता है, बाद में हम उसी इनसान को प्यार करते हैं हैं क्योंकि उसने सही काम किया । हमेशा की तरह अमरदीप अपने अभियान में सफल रहा । शाम के सात बज चुके थे । अमरदीप और एमपी पहली बार उस शहर में आये थे । इसलए हमने तय कि कोलकाता की सड़कों की ख़ाक छानी जाए । सौभाग्य से, हमारे मेजबान के पास दो मोटरसाइकिलें थी–एक उसकी अपनी पल्सर और दूसरी उसके छोटे भाई की स्प्लेंडर । हम तैयार हुए और गराज से हमने मोटरसाइकिलें निकाल लीं । एमपी और मैं स्प्लेंडर पर बैठे, हैप्पी और अमरदीप पल्सर पर ।

विद्यासागर सेतु से हमने चिल्लाते और एक दूसरे से बातें करते, हुगली नदी को पार किया । उस शाम स्पीड ब्रेकर हमारी रफ़्तार को नहीं थाम सके । और हम कहाँ थे? सातवें आसमान पर । अपने सबसे अच्छे दोस्तों के साथ इतने समय बाद होना भावुक भी था और रोमांचक भी । हम विक्टोरिया मेमोरियल और कुछ दूसरी जगहों पर गए । कभी रुककर हमने फलों का जूस पिया, कभी कोलकाता की मशहूर मिठाई और नाश्ते का मज़ा उठाया । कभी हम इसलिए रुके क्योंकि हम में से किसी को पेशाब करना था–एक-दूसरे की देखा-देखी हमें बारी-बारी से खूब पेशाब लगी । किसी स्थान पर हमने कुल्हड़ में चाय का मज़ा लिया । जब एमपी ने पूछा कि हम घर कब जाएँगे तब तक 10.30 बज चुके थे । ‘चिंता की कोई बात नहीं । मेरे पास ऊपर के फ़्लैट की चाबी है । हम जब चाहे जा सकते हैं । उम्मीद करता हूँ कि हम 1 बजे से पहले नहीं जाएँगे,’ हैप्पी ने अपनी आइस-टी का आखिरी घूँट भरते हुए कहा । ‘और तब तक हम कहाँ रहने वाले हैं?’ अमरदीप कुछ चिंतित दिखा । अमरदीप और 11 बजे उसके सोने का समय मुझे याद आया, लेकिन मैंने इस बात की ओर दूसरों का ध्यान नहीं दिलाया । हैप्पी ने मेरी ओर देखा और मुस्कुराते हुए पूछा, ‘क्या हम उसी जगह पर चलें?’ ‘ओह! उस जगह...?’ इससे पहले कि एमपी का दिमाग़ कुछ गंदी बात सोचता, मैंने तस्वीर साफ़ कर देने की सोची । ‘महानुभावों! हम एक बहुत ही अच्छी जगह जा रहे हैं और मैं शर्त लगा सकता हूँ कि तुम दोनों को भी वह जगह...’ मैं अपनी बात समाप्त करने ही वाला था कि एमपी का धीरज जवाब दे गया । उसने मेरी बात काटते हुए कहा, ‘ओह हाँ, मैंने सुना है कि चंद्रमुखी पश्चिम बंगाल की ही थी । तो क्या हम लोग योजना बना रहे हैं कि...?’ उसकी कुटिल मुस्कान और शरारती आँखों ने उसके सवाल को पूरा कर दिया ।

‘बदमाश कहीं के’, हैप्पी ने हँसते हुए कहा । ‘ज्यादा मत सोचो, एमपी । बस हमारे पीछे-पीछे आओ,’ मैंने बात पूरी की । बिना किसी को कुछ बताए हम अपनी मोटरसाइकिल पर बैठे और उस स्थान की ओर चल पड़े । अभी आधी रात भी नहीं हुई थी जब हम उस जगह पर पहुँचे । वहाँ हवा कुछ ठंडी थी । पहली नज़र में ऐसा लग रहा था जैसे हम किसी झोंपड़पट्टी में हों, वहाँ एक पुराना-सा गराज था जिसका शटर गिरा हुआ था । उसके बाहर कुछ ट्रक खड़े थे । उसके ड्राइवर शायद सो रहे थे । हमने एक ट्रक के पीछे मोटरसाइकिल खड़ी की और गराज की दायीं तरफ एक पतली सड़क पर चलने लगे । वहाँ ठीक से रोशनी नहीं थी और एकदम शांति थी । हमारी आवाज़ और चलने की आवाज़ तेज़ी से गूँज रही थी । कीड़ों की आवाजें उस जगह की भयानकता को और बढ़ा रही थीं । एमपी को कहीं से कुत्तों के भौंकने की आवाज़ सुनाई दी । मुझे नहीं लगता कि उसने सचमुच कोई आवाज़ सुनी भी थी । हो सकता है, उसका कमज़ोर दिल ही तेज़ी से धड़कने लगा हो । ‘श्श्श्श्श वे जाग जाएँगे,’ हैप्पी ने अपनी ऊँगली को होंठों पर लाते हुए कहा । ‘कौन?’ अमरदीप खुसफुसाया । ‘सामने लोग ज़मीन पर लेटे हुए हैं! ध्यान से देखकर चलो ।’ हैप्पी ने कहा । ‘लोग! सड़क पर सो रहे हैं?’ अमरदीप कुछ धीरे-धीरे चलने लगा । वे आस-पास के मछुआरे थे । कुछ सो रहे थे और कुछ देसी शराब के नशे में टुन्न पड़े थे । अचानक सड़क एक काठ के बने रास्ते के पास रुक गई । वहाँ सीढ़ियों जैसा कुछ था जो नीचे की ओर जा रहा था । और हमें दूर से एक आवाज़ आती सुनाई दे रही थी, जैसे पानी किनारों से टकरा रही हो । कीट-पतंगों की आवाज़ों को पीछे छोड़ते हुए हम उस रास्ते से उतरने लगे । कुछ ही सेकेंड में हम अपनी मंजिल पर थे ।

यह हुगली नदी थी और हम उसके तट पर खड़े थे । अमरदीप और एमपी का डर खुशी में बदल गया । ‘यह नदी का तट है और अभी हम हावड़ा में हैं । यह वह जगह है जहाँ से नाव दूसरे किनारे कोलकाता शहर में ले जाती है,’ हैप्पी ने नदी की दूसरी ओर इशारा करते हुए घोषणा की । जोश में आकर हम उस काठ की बंदरगाह जैसी संरचना पर कूदने लगे । उस बंदरगाह की तीन तरफ़ नदी अपने पूरे उफान पर थी । वह एक ख़ूबसूरत रात थीं, चाँद हमारे सिर पर था और तारे जगमगा रहे थे । और आकाश के नीचे हम चार थे । हम बंदरगाह के किनारे एक विशाल लंगर के पास बैठ गए । नदी ठंडी हवा को बेधती हुई बंगाल की खाड़ी से मिलने के लिए बढ़ रही थी । उस ख़ामोशी में बंदरगाह से पानी के टकराने की आवाज़ साफ़ सुनाई दे रही थी । नदी की दूसरी तरफ कोलकाता शहर था । ऊँची इमारतें और छोटी-छोटी पीली रोशनी की झालर मुझे न्यूयार्क के आसमान की याद दिला रही थी । लेकिन यह उससे भी अधिक अच्छा था क्योंकि मैं अपने दोस्तों के साथ था । हमने अपनी बाँहें फैलाकर गहरी, लंबी साँसें लीं । ताज़ी, ठंडी हवा अंदर लेते हुए, हम उस जगह की ख़ूबसूरती से मदहोश थे । उसी समय हैप्पी बोल पड़ा । ‘तो?’ उसने अमरदीप की ओर देखते हुए पूछा । ‘क्या?’ जवाब में अमरदीप ने पूछा, क्योंकि उसे हैप्पी के ‘तो’ का मतलब समझ में नहीं आया । ‘तो कैसी लगी यह जगह, झक्कास?’ ‘ओह! यह जगह? मैं इससे बेहतर जगह के बारे में सोच नहीं सकता । यह तो स्वर्ग है ।’

और एक बार फिर ठंडी हवा के झोंके ने हमें घेर लिया । हम बंदरगाह पर बैठ गए । उसी समय चर्चा शुरू हो गई । एक गंभीर चर्चा; एक ऐसी चर्चा जिसने मेरे जीवन को बदल कर रख दिया । इसकी शुरुआत एक और ‘तो’ से हुई । ‘तो,’ अमरदीप ने इस बार हैप्पी की ओर देखते हुए कहा । ‘क्या?’ हैप्पी ने अपनी ठुड्डी उठाते हुए पूछा । ‘अगली खास बात क्या है?’ अमरदीप ने पूछा ‘तुम्हारा मतलब डिनर से है?’ एमपी बीच में बोल पड़ा । ‘नहीं, मेरा मतलब जिंदगी की अगली महत्वपूर्ण चीज़ से है । स्कूल की पढ़ाई हो गई । इंजीनियरिंग की पढ़ाई भी हो गई । अच्छी-ख़ासी नौकरी भी मिल गई । विदेश भी हो आये । बैंक में पैसा जमा होता जा रहा है । मील का अगला पत्थर क्या है?’ ‘हाँ! मैं समझ गया कि तुम क्या बात कर रहे हो,’ अपनी पहले से उठी हुई ठुड्ढी मेरी तरफ घुमाते हैप्पी ने हाँ में हाँ मिलाई, ‘इससे पूछो,’ हुए उसने कहा । सब मेरी ओर देखने लगे । ‘मुझे पता नहीं कि तुम लोगों के जीवन में, घर में क्या हो रहा है, लेकिन मेरे मम्मी-पापा तो जैसे पागल हो रहे हैं । वे मेरे पीछे किस तरह पड़े हैं कि तुम सोच भी नहीं सकते । क्या मैं अकेले अच्छी तरह से नहीं रह सकता?’ अमरदीप ने कहा ।

‘तो क्या तुमने या तुम्हारे परिवार ने कुछ तय कर लिया,’ मैंने उससे पूछा । ‘नहीं, मेरी कहानी भी तुम लोगों की तरह ही है । लेकिन सच्चाई यह है कि एक दिन हम लोगों को अपने-अपने जीवनसाथी के साथ घर बसाना होगा । कब तक हम लोग अपने माता-पिता के सवाल को टाल सकते हैं? हमको लेकर उनकी भी कुछ उम्मीदें हैं, कुछ सपने हैं ।’ ‘मैं जानता हूँ कि तुम क्या कहना चाह रहे हो अमरदीप । लेकिन क्या तुम सचमुच अपनी पूरी जिंदगी किसी के साथ बिताने के लिए तैयार हो? मेरा मतलब है कि होस्टल में 4 साल के दौरान ऐसे कई मौके आए जब हमें एक-दूसरे के साथ तालमेल बिठाना पड़ा...यह तो जीवन भर के लिए होगा,’ हैप्पी ने कहा । ‘लेकिन देर-सबेर हमें यह करना होगा, समझे?’ अमरदीप बोला । ‘अगर हम इसी तरह से रह गए तो क्या होगा?’ एमपी बोला । ‘ज़रा कल्पना करो कि 60 साल की उम्र में तुम अकेले रह रहे हो । जीवन इतना आसान नहीं है, मेरे दोस्त । यह एक यात्रा है और जीवन साथी के साथ इसे सबसे आसानी से पूरा किया जा सकता है ।’ अमरदीप बोला । उस रात नदी-किनारे हम चारों ने इस मसले पर बड़ी गंभीरता से चर्चा की, पहली बार । शायद पहली बार हमने महसूस किया कि हम इतने बड़े हो गए हैं कि इसके बारे में बातें कर सकें । अनेक तरह के सवाल, किंतु-परंतु उठे और हमने उनके जवाब भी दिए । अनेक तरह के पहलुओं को लेकर चर्चा हुई । हम में से कोई भी शादी के खिलाफ नहीं था लेकिन हम उसके फ़ायदों को अच्छी तरह परखना चाहते थे । अमरदीप और मैं तो शादी को लेकर काफ़ी हद तक तैयार थे । और इस चर्चा ने हैप्पी और एमपी को इस मसले में गंभीरता से सोचने पर मजबूर किया, हालाँकि इस चर्चा से वे राज़ी नहीं हुए थे । (जिससे मुझे एक टी-शर्ट पर लिखा यह नारा याद आता हैः अगर तुम उसे राज़ी नहीं कर सकते तो बस थोड़ा-सा भ्रम में डाल दो ) । ‘फिर और बातों को लेकर भी चर्चा हुई । प्रेम विवाह या अरेंज मैरेज? माँ-बाप की पसंद से या अपनी पसंद से?’ हैप्पी बोला ।

‘अब यह तो निजी पसंद का मामला है । अब चूँकि हम अपने पैरों पर खड़े हैं मुझे नहीं लगता कि हमारे माता-पिता हमारे फैसले पर किसी तरह का एतराज़ के लोगों से मिल-जुल सकें । और सबसे बदतर बात यह है कि हम में से कोई भी अपने मम्मी-पापा द्वारा चुनी गई लड़की से शादी नहीं करना चाहता, अगर मैं गलत नहीं कह रहा हूँ तो,’ एमपी बोला । ‘मुझे पता नहीं कि तुम्हारा आखिरी वाक्य सही है या नहीं, लेकिन बाकी चीज़ें तो तुम्हारे अपने हाथ में हैं,’ अमरदीप ने जवाब दिया । ‘लेकिन एमपी की बात में दम है । जहाँ तक मेरी बात है, तो मैं अपनी पसंद की लड़की से शादी करना चाहूँगा, लेकिन पिछले एक साल से मैं विदेश में हूँ । और पता नहीं शायद अगले एकाध साल में भारत लौटूँगा । इस बात को ध्यान में रखते हुए मेरे लिए शादी के बारे में कुछ योजना बना पाना बहुत मुश्किल है । और मेरे जैसे आदमी के लिए किसी ऐसी लड़की के साथ घर बसा पाना असंभव ही है जो हिंदुस्तानी न हो । हिंदुस्तानी भी छोड़ो, उसे सबसे पहले पंजाबी होना चाहिए,’ मैंने कहा । ‘तुमने इनफोसिस में नौकरी के लिए अप्लाई कैसे किया?’ अमरदीप ने बात बदलते हुए पूछा । मैंने जवाब दिया, ‘बेबसाइट के माध्यम से ।’ ‘और हैप्पी, तुमने लंदन से अपने मम्मी-पापा को पैसे कैसे भेजे?’ ‘इंटरनेट बैंकिंग अकाउंट के माध्यम से । वह काफी तेज़ी से काम करता है,’ उसने जवाब दिया ।

‘देखो? दुनिया इंटरनेट प्रेमी होती जा रही है । इस बात के मद्देनज़र कि हम सब आईटी वाले हैं जो लगभग रोज ही नेट पर होते हैं, हम शादी के लिए भी इसका उपयोग क्यों नहीं कर सकते?’ ‘तुम शादी.कॉम जैसी वेबसाइट के बारे में बात कर रहे हो?’ हैप्पी ने पूछा । ‘हाँ ।’ ‘वे सचमुच किसी काम के होते भी हैं? मुझे नहीं लगता,’ एमपी ने अपनी बात रखी । ‘यह जानने के लिए कि खाना मीठा है या नमकीन आपको पहले उसे चखना होता है । किसी चीज़ को पक्के तौर पर जानने का वही एक तरीका होता है,’ अमरदीप ने जवाब दिया । ‘या बेहतर तरीका यह है कि किसी ऐसे आदमी से पूछा जाए जिसने उसे पहले चख रखा हो । कोई जोखिम क्यों लें?’ हैप्पी ने हमें हँसाने के ख़्याल से कहा । ‘तो रामजी, तुमने ऐसी कोई वेबसाइट देखी है?’ मैंने पूछा । ‘अभी तो नहीं । लेकिन मैं उसके बारे में सोच रहा हूँ... ।’ जब हमने कुछ नहीं कहा तो उसने समझाना शुरू कर दिया, ‘इस सेवा की सबसे बड़ी ख़ासियत यह है कि आप बहुत सारे लोगों के बारे में जान सकते हैं । इससे आपको अपने लिए बेहतर साथी चुनने में मदद मिलती है । और आप उससे बातचीत कर सकते हैं जिसमें आपको इंटरेस्ट जगे...सब कुछ बेहद सलीके से होता है । सबसे बढ़कर आपको इस बात की चिंता भी नहीं करनी होती कि आप किस जगह पर हैं...’ अमरदीप ने कुछ ऐसी बातें रखीं जिसके बारे में बहस करने के लिए शायद हमारे पास कुछ खास था नहीं ।

‘हूँ...ठीक है, मुझे यह तो पता नहीं है कि इन सबसे कुछ होता है, लेकिन एक बार इसे आज़माना ज़रूर चाहिए । कौन जानता है...?’ यहाँ तक कि एमपी भी वजूद की याद दिलायी । अमरदीप ने कहा, ‘अब काफी देर हो चुकी है और मुझे बेहद भूख लगी है । घर चलते हैं,’ कहते हुए वह उठ खड़ा हुआ । ‘तो वह पहला आदमी कौन है?’ जब हम अपने कपड़ों की धूल झाड़ रहे थे एमपी ने पूछा । ‘सबसे पहले शादी करने वाला? या वेबसाइट पर सबसे पहले अपनी प्रोफाइल डालने वाला?’ हैप्पी ने हँसते हुए पूछा । ‘दोनों ।’ ‘मुझे लगता है यह,’ हैप्पी ने मेरी तरफ ऊँगली दिखाते हुए कहा, ‘पता नहीं क्यों ।’ सुबह के करीब 4 बज चुके थे । हम खाना खाकर सोने चले गए । बहुत समय बाद, मैंने उस तरह नींद का आनंद लिया जिस तरह हम होस्टल में लिया करते थे । वह दिन हमारे जीवन का एक यादगार दिन बन गया । अगला दिन हमने कोलकाता की कुछ मशहूर जगहों को देखते हुए बिताया । और हम उस दिन शाम को फिर से नावों वाले घाट पर गए मेरा यकीन कीजिए, वह 1912 के टाइटेनिक की सवारी से कुछ कम मज़ेदार नहीं था, अपने सबसे अच्छे दोस्तों के साथ होना तो और भी आनंददायक था । हमने सम प्लेस एल्स नाम के एक पब में खूब खाया, पीया और बातें की । वह हमारे पुनर्मिलन की आखिरी रात थी ।

सब मुझे छोड़ने के लिए हावड़ा स्टेशन पर आये और एक बार फिर हम चारों वैसे ही गले मिले जैसे हम कॉलेज के आखिरी दिन हैदराबाद स्टेशन पर मिले थे । ‘सबसे पहले कौन रोने वाला है?’ एमपी ने पूछा । लेकिन हम सब उस अहमक़ाना और भावुक सवाल पर हँसने लगे । ट्रेन ने अपनी आख़िरी सीटी बजाकर मुझे बुलाया । मैं डिब्बे में सवार हो गया और गेट पर खड़ा होकर तब तक उन सबको हाथ हिलाकर विदा कहता रहा जब तक ट्रेन प्लेटफोर्म से खिसकती रही । मैं अगले दिन सुबह भुवनेश्वर पहुँच गया । उसी सुबह अमरदीप और एमपी ने अपने-अपने ठिकानों के लिए फ्लाइट पकड़ ली...उसके कुछ देर बाद हैप्पी भी लंदन के लिए उड़ गया ।

- रविंदर सिंह

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